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शिक्षित लोग भी क्यूँ करते हैं नॉन- सेन्स हरकतें

शिक्षित लोग भी क्यूँ करते हैं नॉन- सेन्स हरकतें

Image Credit: Freepik

ऐसा माना जाता है कि शिक्षा इंसान को समझदार बनाती है। और क्योंकि कोई पढ़ा लिखा नहीं है तो वे समझदार नहीं है या गवार है, लेकिन ये सोचिए कि किसी की समझदारी को कुछ सर्टिफिकेट्स से कैसे आँका जा सकता है। अगर इतिहास को खंगाला जाए तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जिन्हे पारंपरिक शिक्षा नहीं मिली पर वे बहुत समझदार थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अकबर जो की लगभग हर क्षेत्र में समझदारी से काम लेते थे।

ऐसा माना जाता है कि शिक्षा इंसान को समझदार बनाती है। और क्योंकि कोई पढ़ा लिखा नहीं है तो वे समझदार नहीं है या गवार है, लेकिन ये सोचिए कि किसी की समझदारी को कुछ सर्टिफिकेट्स से कैसे आँका जा सकता है। अगर इतिहास को खंगाला जाए तो हमें ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे जिन्हे पारंपरिक शिक्षा नहीं मिली पर वे बहुत समझदार थे .इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अकबर जो की लगभग हर क्षेत्र में समझदारी से काम लेते थे।

कॉमन सेंस का अभाव और अनुभव का रिश्ता 

क्या गँवार लोग सारी हरकतें नॉन सेन्सिबल करते हैं और पढ़े लिखे सेंसिबल ही होते हैं?

एक बार एक शिक्षित व्यक्ति ने दरवाजा ग़लत तरफ खोल दिया तो क्या उससे कोई गुनाह हो गया? बात ये नहीं है कि वो सही था या नहीं दरअसल बात इतनी सी है हमारी सोच ही ग़लत है। सेनसिबिलिटी कभी भी विद्यालयों में नहीं पढ़ाई जाती। ये कोई सिखाने का विषय है ही नहीं बल्कि ये तो अनुभवों से ही आती है।

गिरकर सकपकाना भी तो है नॉन सेन्सिबल 

क्या आप कभी बीच सड़क पर गिरे हैं? गिरे ही होंगे या किसी को देखा होगा। जब भी ऐसा होता है तो गिरने वाला व्यक्ति सकपका जाता है उसे लगता है कि सब उसे ही देख रहे हैं। जब वो उठेगा तो उसका मज़ाक उड़ाया जाएगा . क्या मैं गिरा पड़ा हूँ? एखीं भावना का व्यक्ति हमेशा ऐसा ही सोचता है। वो जीवन भर सकपकता है। क्या ये बात नों सेंसिबल नहीं है। एक समझदार पढ़ा लिखा व्यक्ति खुद को इतना हीन कैसे मान सकता है। बात पचती नहीं है ना? लेकिन ऐसा होता है इसलिए अगली बार जब गिरें तब नज़रें उठाकर देखना, आपकी तरफ हाथ बढ़ेंगे आपको उठाने के लिए।  हाँ कुछ लोग हँस भी रहे होंगे एक ठहाका आप भी लगा देना।

बच्चों से सीखें सेन्सिबल बनना 

कभी छोटे बच्चे को ध्यान से देखिए। वो अलग अलग तरीकों से एक ही काम करता है, कभी दीवार पर पेंसिल और पेन चलाता है तो कभी रंग भरता है। गिरकर देखता है कि कोई उसे देख रहा है या नहीं, अगर कोई देखे तो रो पड़ेगा, अगर नहीं तो उठकर दोबारा खेलने लगेगा। अगर ध्यान से देखें तो सबसे ज़्यादा सेन्सिबल शायद बच्चे ही होते हैं, उन्हें ज़्यादा अच्छे से पता होता है कि किससे, कब, क्या और कैसे निकालना है। जब वो बड़ा होता है पढ़ने लिखने लगता है तब उसके दिमाग में धीरे धीरे सेंसिबिलिटी का कीड़ा आ जाता है, उस से गलतियां करने का हक़ छीन लिया जाता है . एक समय आता है जब पढ़े लिखे या एजुकेटेड होने का प्रेशर सर चढ़कर बोलने लगता है ऐसे में व्यक्ति ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार बन जाता है और सेन्सिबल होने के बोझ तले ज़्यादा नॉन-सेन्सिबल हो जाता है।

साइंटिफिक स्टडीज़ भी यही कहती हैं कि ओवर कॉन्फिडेंस एक बड़ी वजह है जिससे लोग ज्यादा गलतियां करते हैं।यही कारण है कि एजुकेटेड लोग भी नॉन सेन्स हरकतें करते हैं।निष्कर्ष यह निकलता है कि हम एजुकेटेड लोगों की हरकतों को सेंसिबिलिटी या नॉन-सेंसिबिलिटी के नजरिए से ज्यादा देखते हैं।

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